आदिवासी ओझा समाज द्वारा बालपुर ,सरोरा (mp) में बैठक आयोजित किया गया ।

bisau netam October 03, 2021

 2 अक्टूबर गांधी जयंती के अवसर पर आदिवासी ओझा  समाज ऑनलाइन परिचय यात्रा द्वारा बालपुर सरोरा में सामाजिक बैठक आयोजित किया गया। 




सभी समाज के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा किया गया। आदिवासी ओझा समाज के शिक्षा के क्षेत्र में एवं आर्थिक क्षेत्र में विशेष जोर देने की बात कही गई, 

सभी सम्मानित पदाधिकारियों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में विशेष तौर से जोर दिया गया। 

साथ ही गांधी जयंती के अवसर पर गांधीजी के सिद्धांत एवं अहिंसा के मार्ग को अपनाने के लिए कहा गया। 

छुआछूत,सामाजिक दूरियां इन बिंदुओं को विशेष तौर से जोर दिया गया सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के बारे में समाज के लोगों को जागरूक करें।

साथी राष्ट्रीय स्तर के समिति गठन के संबंध में भी विशेष रूप से चर्चा किया गया एवं सभी सामाजिक बंधुओं द्वारा इस फैसले पर निर्णय लिया गया कि सभी राज्यों के लिए एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति की गठन जल्द से जल्द होनी चाहिए। 



आदिवासी ओझा सामाजिक पदाधिकारी के द्वारा महत्वपूर्ण सुझाव दिया गया- 

  • आदरणीय कमलेश उइके  एवं दौलतराम उइके  द्वारा कर्मचारी संगठन बनाने की बात कही गई। जोकि कर्मचारी संगठन द्वारा आने वाले पीढ़ी को प्रेरित करने का काम एवं समाज को नई दिशा एवं निर्देश देने के काम करेंगे। 
  • आदरणीय मूलचंद मरार द्वारा सभी कर्मचारियों को ऑनलाइन परिचय यात्रा द्वारा गूगल मीट में सम्मिलित होने की बात कही गई। 

गांधीजी जयंती के अवसर पर आयोजित ओझा समाज बैठक में उपस्थित थे स्वतंत्र संग्राम सेनानी मंशु ओझा  के सुपुत्र इमरत पाखरे जी एवं इसी आदरणीय क्रम में बैतूल  घोड़ाडोंगरी से उपस्थित रहे  मूलचंद मरार, साहब मरार, मुन्नालाल मरार, प्रेम मरार,साहबू मरार, अंगद मरार,रमेश पाखरे,इमरत पाखरे,अमर दास पाखरे, एवं विशेष रूप से सम्माननीय क्रम में कलावती पाखरे जी, सिमरत पाखरे ,मुनिया बाई मरार जी महिला सदस्य भी उपस्थित रहे, साथी सुनील पाखरे अंकित पाखरे, कमल मरार, विनोद सोनवानी, सुरेंद्र सोनवानी, सुना भाई गुड हरिया,  मीटिंग में उपस्थित रहे। 

साथी मंडला जिला से कमलेश कुमार उइके , नंदकिशोर मरावी, कृष्ण कुमार उइके, लक्ष्मी उइके, भारत पर्ते।  

बालाघाट से सुखदेव कुमरे, सुमरन  पटवारी,कर्म सिंह मंडावी। 


विशेष आभार एवं धन्यवाद के पात्र हैं आयोजक समिति के पदाधिकारी अमन सिंह उइके ,छब्बिलाल उइके ,दौलत उइके,दस्सी भलावी,करण सिंह उइके,सुरेश सिंह उइके,बिरझू उइके,देवेन्द्र उइके,भवानी उइके,प्रकाश उइके,श्रीमती  देवकला उइके पत्नी  (स्व.अन्तुलाल उइके )  बालपुर ,सरोरा, के सामाजिक भाइयों द्वारा सफल मीटिंग आयोजन करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं ।

बिसाऊ ओझा - संचालक ओझा समाज (छत्तीसगढ़)🙏इन्हीं शुभकामनाओं के साथ समस्त ग्रामवासियों एवं ओझा भाइयों को मेरी ओर से बहुत-बहुत हार्दिक  बधाइयां एवं शुभकामनाएं😊

 


छत्तीसगढ़ आदिवासी ओझा जनजाति के बारे में जाने 😐

bisau netam September 28, 2021

 आदिवासी अनुसूचित जनजाति ओझा जाति  

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पहले एक ही राज्य  थे । छत्तीसगढ़ राज्य 1 नवंबर 2000 को अलग होकर अस्तित्व में आया छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत  42 जाति आते हैं । छत्तीसगढ़ में आदिवासी ओझा के बारे में बात  किया जाए तो 42 अनुसूचित जनजाति के सूची में 16वे नंबर पर आता है । नाम कुछ इस प्रकार से है -

  • 16.गोंड; अरख, अर्रख, अगरिया, असुर, बदी मारिया, बड़ा मारिया, भटोला, भीम, भूता, कोइलभुट्टा, कोलिभुती, भर, बिसनहोर मारिया, छोटा मारिया, डंडिया मारिया, धुर्वा, धोबा, धुलिया, डोरला, गिकी, गट्टा, गट्टा, गट्टा , गीता, गोंड, गौरी हिल मारिया, कंदरा, कलंगा, खटोला, कोइरा, कोयरा, खिरवार, कुचरा मारिया, कुचिया मारिया, मडिया, मारिया, मैना, मनेवर, मोग्या, मोगिया, मंधिया, मुड़िया, मुरिया, नगरची, नागवंशी , ओझा, राज गोंड,सोनझरी, झरेका, थटिया, थोडा, वेड मारिया, वेड मारिया, दारोई


छत्तीसगढ़ में आदिवासी ओझा  जनजाति कौन - कौन से जिले में हैं ? 

छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से एवं  जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो कांकेर जिले में सर्वाधिक ओझा जाति के लोग निवासरत हैं कोंडागांव , राजनांदगांव , नारायणपुर, जगदलपुर ,कवर्धा ,गरियाबंद ,बीजापुर ,बस्तर संभाग में प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़ में आदिवासी ओझा  जनजाति  के लोग निवासरत हैं।16वे नंबर पर प्रमुख रूप से  गोंड जनजाति है फिर जितने भी गोंड जाति के साथ जुड़े हुए हैं वह गोंड के उपजाति कहलाते हैंअत: आदिवासी ओझा जाति भी गोंड की उपजाति है

आदिवासी ओझा  जनजाति आदिवासी में आते हैं कि नहीं? 

ओझा जाति और ओझा गोत्र में बहुत अंतर है बहुत लोग कंफ्यूज हो जाते हैं। जो पहली बार सुनते हैं वह आदिवासी ओझा को ब्राह्मण समझ लेते हैं।मैं यहां पर स्पष्ट कर देना चाहता हूं ब्राह्मण के कास्ट ब्राह्मण होते हैं।और उनके गोत्रावली ओझा लिखते हैं,जैसे कि फेमस क्रिकेटर है प्रज्ञान ओझा तो वह ओझा आदिवासी नहीं है। वह एक ब्राह्मण है  आदिवासी ओझा के संस्कृति भाषा बोली सब बाकी जो अनुसूचित जनजाति के संस्कृति होती है,रीति- रिवाज होती है वैसे ही होती हैं।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अनुसार और 2000 के अधिनियम 28 द्वारा डाला गया है।
इसलिए आदिवासी ओझा जाति अनुसूचित जनजाति में आते हैंसरकार के जितने भी अनुसूचित जनजाति से संबंधित छुट ,आरक्षण एवं सरकारी योजनाएं हैं सभी के लाभ ओझा जाति के लोग लेते हैं


छत्तीसगढ़ ओझा जनजाति के संस्कृति भाषा बोली कैसे होती है ? 

आदिवासी ओझा जाति के लोग भी बाकी अनुसूचित जनजाति के जातियों की तरह गोंडी ,पारसी,हल्बी  इत्यादि भाषा , बोली बोलते हैं प्रमुख रूप से देखा जाए तो आदिवासी ओझा जाति के जो बोली होती है वह पारसी होती हैयही उनकी पहचान होती है 
आदिवासी महिला एवं पुरुष दोनों ही अपने हाथ एवं पैरों में गोदना गोदवाते हैं श्रृंगार की दृष्टि से देखा जाए तो अधिकांश महिलाएं गोदना के माध्यम से श्रृंगार करती हैं एवं बाकी अनुसूचित जनजातियों के महिलाओं को  गोदने का काम करते हैं मुख्य रूप से जो अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को गोदने का जो काम होता है वह आदिवासी ओझा महिलाओं के द्वारा किया जाता है पुरानी परंपराएं अनुसार यदि आदिवासी महिलाएं गोदना नहीं गोदवाते हैं तो उनके श्रृंगार अधूरी मानी जाती है ।आज भी ओझा जाति के महिलाओं द्वारा गोदना कार्य किया जा रहा है

                                         

आदिवासी ओझा समाज के मुख्य संस्कृति है ढाहकी बजाके लोगों को मनोरंजन करना।आदि अनादि काल से चली आ रही है आदिवासी के पारंपरिक संस्कृति में से एक है ओझा ढाहकी गीत। राजा महाराजाओं के जमाने में राजा के दरबारों में आदिवासी ओझा जनजातियों के माध्यम से मनोरंजन किया जाता था। फिर अंग्रेजों के साथ युद्ध के दरमियान भी क्रांतिकारी सेनाओं को मनोरंजन करने का काम आदिवासी ओझा जनजातियों के द्वारा किया गया है। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें मध्यप्रदेश बेतुल घोड़ाडोंगरी स्वतंत्र सेनानी 👉मंशु ओझा 






एक दिवसीय प्रादेशिक सेमिनार भोपाल

bisau netam September 20, 2021

जीवन परिचय मंशु ओझा

bisau netam April 20, 2021

 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा जीवन परिचय 


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा का जन्म कहाँ हुआ ? 


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा पिता उमराव ओझा का जन्म रातामाटी में हुआ। बाद में बाजार ढाना ओझा मोहल्ला घोड़ाडोंगरी जिला बैतूल के निवासी हो गये। गरीबी होने के कारण पारिवारिक स्यतिथि बहुत खराब थी 

जिसके कारण इनकी शिक्षा भी ना के समान थी ।


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा भारत छोड़ो आन्दोलन में कैसे सम्मलित हुए ?


सन् 1942 में भारत देश में एक ऐसा ऐतिहासिक आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसे भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। 

08 अगस्त 1942 को रात्रि में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव मुम्बई में पारित हुआ ओर आन्दोलन को शुरू होने से पूर्व ही 09अगस्त को रात्रि में अंग्रेज सरकार ने महात्मा गाँधी सहित मौलाना आजाद, सरदार पटेल,जवाहरलाल नेहरु आदि कार्यकारणी के अन्य सदस्यों को बन्दी बनाकर पूना भेज दिया गया। इस कार्यवाही से जनसमूह सड़कों पर उतरकर आ गया। देशभर में हड़ताल, प्रदर्शन व सभाओं का आयोजन हुआ दिल्ली ओर मुम्बई जैसे बड़े बड़े शहरों में नगर, तहसील व ग्राम में जनता संगठित होकर आन्दोलन को शुरू कर दिया।  सरकार ने आन्दोलन को समाप्त करने के लिये गोलियां चलाई, लाठी चार्ज किया और हजारों की संख्या में गिरफ्तारियां हुई मध्य प्रदेश में सागर, जबलपुर, मंडला, बैतूल रियासतों में कई जगह आन्दोलन ने उग्र रूप ले लिया।  


आदिवासी ओझा समाज के क्या योगदान है ?


सन् 1942 में आजादी की चिंगारी एक ज्वाला के रूप में पूरे भारत देश में फैल चुकी थी    

इस आजादी की चिंगारी में देश के कई हजारों आदिवासी गोंड, कोरकू, ओझा, बैगा,परधान,भील,भिलाला,मुण्डा, मुआसी आदि जनजातियों के लोगो ने भी आन्दोलन में भाग लिया सन् 1942 के यहा आन्दोलन में कई आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने मिलकर बैतूल जिला के घोड़ाडोंगरी क्षेत्र में रेल की पटरी उखाड़ने ओर पुल बोगदा को नुकसान पहुंचाते हुए बिजली के तार को काटते हुए घोड़ाडोंगरी में लकड़ी का डिपो जला दिया।इस आन्दोलन में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की टुकडियो में ओझा समाज का बाना ढ़ाक को बजाकर देश भक्ति गीत गाते हुए सभी साथियों का हौसला बढ़ाते हुए स्वयं भी आगे आगे चलकर आन्दोलन में भाग लेते थे। 


इन्होने भारत देश की मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने में आजादी के लिये संघर्ष करते हुए बैतूल जिला में कई आन्दोलनों में भाग लिया जिसके कारण बैतूल जिला में भी 

बडे पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई। इस गिरफ्तारी में श्री मंशु ओझा पिता उमराव ओझा रातामाटी, श्री डोमा गोंड पिता फगना गोंड रातामाटी, श्री मग्गू गोंड पिता जुगलबंदी गोंड रातामाटी, श्री मानसिंह पिता मंजलु उइके महेन्द्रवाडी,श्री लक्ष्मण गोंड पिता गोरा गोंड सड़कवाला,श्री लाट प्रधान पिता देवी प्रधान रातामाटी, श्री विष्णु गोंड पिता मंगता गोंड रातामाटी से कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को 04-11-1942 को गिरफ्तार कर लिया गया ओर बैतूल जेल में रखा गया। 

गिरफ्तार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या अधिक होने के कारण बहुत से बंदियों को नागपुर एवं  नरसिंहपुर जेल स्थानान्तरित कर दिया दिनांक- 04-11-1942 से 20-07-1944 तक कठिनाईयाँ झेलते हुए। 

अंग्रेजी सरकार की यातनाये सहते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा पिता उमराव ओझा नरसिंहपुर जेल में कारावास की सजा भुगते।  


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा के कारण ही आज ओझा जाति का सर गर्व से ऊॅचा हुआ है?


देश के मूल निवासी आदिवासीयों ने भी अपने प्राणों की बाजी लगाकर भारत देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंशु ओझा के कारण ही आज ओझा जाति का सर गर्व से ऊॅचा हुआ है। भारत देश की आजादी में ओझा जनजाति का भी योगदान रहा है। मध्य प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जिला व केन्द्रीय सम्मान निधि नियम 1972 नियम 2,3 के अंर्तगत घोषित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में दर्ज है। स्वतंत्रता के पच्चीसवें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान के लिए राष्ट्र की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने 15 अगस्त 1972 को ताम्रपात्र मंशु ओझा पिता उमराव ओझा को भेट किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारक घोड़ाडोंगरी में आज भी मंशु उमराव ओझा का नाम अंकित है। 

इनका स्वर्गवास देश की आजादी के बाद घोड़ाडोंगरी जिला बैतूल में दिनांक-28-08-1981 को हुआ।





सम्पर्क-

मोहन ओझा भोपाल मध्य प्रदेश मोबाइल नंबर-9893314850



आदिवासी ओझा समाज के इतिहास क्या है ?ojha caste in hindi

bisau netam March 26, 2021

आदिवासी ओझा जाति की इतिहास क्या है ?


ओझा कौन से जाति में आते हैं ?


नमस्कार साथियों, आज के पोस्ट में मैं आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहा हूं बहुत सारे इंटरनेट पर भ्रांति फैली हुई है आदिवासी ओझा जाति के संबंध में सरकारी रिकॉर्ड एवं ओझा जाति के इतिहास के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। 


बहुत सारे फिल्म एक्टर, क्रिकेटर, फेमस व्यक्तियों के सरनेम, कई राजनीतिक पार्टियों में भी अच्छे ऊंचे पद पर नेता हैं जिनके सरनेम ओझा है। क्या वह आदिवासी है या नहीं इसी के बारे में विस्तार से इस आर्टिकल को पढ़ें और अपने साथियों तक जानकारी को व्हाट्सएप, फेसबुक के माध्यम से शेयर करें। 


आदिवासी ओझा समाज


ओझा सरनेम कौन से जाति के लोग लिखते हैं? 


ओझा सरनेम ब्राह्मण जाति के लोग लिखते हैं। ब्राह्मण में भी जातियों के कई प्रकार होते हैं कई ब्राम्हण ओझा सरनेम लिखते हैं, एवं बहुत सारे ब्राह्मण झा सरनेम भी लिखते हैं। 


ओझा कौन से जाति मैं आते हैं ? 


ओझा आदिवासी समुदाय में आते हैं। जिनके सरनेम ओझा होते हैं वह आदिवासी नहीं कहलाते हैं। क्योंकि जाति और सरनेम दोनों अलग-अलग होती है। गोंड की उपजाति ओझा कहलाती है और जहां-जहां गोंड निवास करते हैं वहां ओझा जाति के लोग निवास करते हैं। 

आदिवासी  की गोंड जनजातियों की तरह ही ओझा  जनजाति की परम्पराएं, जीवन शैली है।


ओझा जाति  की उत्पत्ति गोंड  जाति का उपजाति  मानते हैं।



क्या उत्तर प्रदेश में आदिवासी ओझा जाति के लोग निवास करते हैं? 


जी हां गोंड, नायक, धुरिया, के साथ ओझा जाति के लोग उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में निवास करते हैं। बहुत सारे ब्राह्मणों ने ओझा सरनेम के आड़ में सरकार को धूल झोंकने के काम किए हैं। और इसी वजह से आज उत्तर प्रदेश में आदिवासी ओझा जाति संकट में है। 





आदिवासी ओझा जाति के लोग कौन-कौन से राज्य में निवास कर रहे हैं?


जंहा -जंहा गोंड जाति है वंहा ओझा जाति के लोग निवास करते हैं ,जनसँख्या की दृष्टी से देखा जाय तो ओझा जनजाति मध्यप्रदेश में सबसे अधिक  हैं। लेकिन धीरे- धीरे  वे स्थान परिवर्तन करने लगे और महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़ ,तेलंगाना ,ओडिशा,उत्तरप्रदेश  की ओर चले  गए।


आरंभिक दौर में इनकी बसाहट छत्तीसगढ़ फिर मध्यप्रदेश के बेतुल घोड़ाडोंगरी  व शिवनी  जिले में अधिकाधिक होती गई।



सरकारी आंकड़ों में कौन से नंबर पर अंकित है? 


अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन )अधिनियम ,1976 के अनुसार और 2000 के अधिनियम 28 द्वारा डाला गया है । छत्तीसगढ़ में 16 ,मध्यप्रदेश में 16 ,महाराष्ट्र में 18 नंबर पर अंकित है। 


बाकी के राज्यों में सरकारी आंकड़ों में दर्ज क्यों नहीं है? 


ओझा जाति अत्यंत पिछड़ी जाति है एवं शिक्षा भी बहुत ही दयनीय स्थिति में है, भारत देश के आजाद होने के बाद भी ओझा एक ऐसी जाती है जहां विकास के नाम पर आज भी शून्य पर खड़ी है। और यही स्थिति पहले भी थी जब सरकार द्वारा जनगणना कराई गई। तो सभी से सवाल जवाब किया जाता है उसी प्रकार से ओझा जातियों के लोगों से भी सवाल जवाब किया गया आपके गोत्र क्या है? ओझा जाति के गोत्र भी गोंड जाति के समान ही है मंडावी ,नेताम ,उइके ,भलावी पर्ते, कुंजाम, आत्रम , कोवा  इत्यादि। हालांकि ओझा जाति के गोत्र अलग होते हैं उस समय में जानकारी के अभाव में सभी लोग गोंड जाति के गोत्र बताने लगे और जनगणना अधिकारियों को भी जानकारी नहीं होती थी इस कारण से उन्हें गोंड जाति में सम्मिलित कर दिए हैं। जैसे उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना यहां अभी सरकार से बातचीत हो रही है और जल्दी सरकारी आंकड़ों में दर्ज की जाएगी।


ओझा जाति के गोत्र कौन कौन से हैं? 


ओझा जाति के गोत्र- मरार,बड़े मरार,छोटे मरार,पुरवाईया,पखरवाल,मरार,पखिरबाल,भरेवा,सिंगूमारिया, पखिरबाल आदि ओझा जाति के गोत्र हैं। 


ओझा जाति के लोगो का भाषा क्या है ?

ओझा जाति के लोग गोंड जाति के तरह गोंडी , पारसी  भाषा बोलते है  । 


क्या ओझा जाति के लोगों का आजादी आंदोलन में कोई सहयोग है?


स्वतंत्र रहने वाले ओझाओ ने अंग्रेजी शासन को लोहे के चने चबवा दिए थे भारत देश की आजादी में ओझा जनजाति का भी योगदान रहा है। मध्य प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 


जिला व केन्द्रीय सम्मान निधि नियम 1972 नियम 2,3 के अंर्तगत घोषित स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में दर्ज है। स्वतंत्रता के पच्चीसवें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान के लिए राष्ट्र की ओर से पूर्व


 प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने 15 अगस्त 1972 को ताम्रपात्र मंशु ओझा पिता उमराव ओझा को भेट किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारक घोड़ाडोंगरी में आज भी मंशु उमराव ओझा का नाम अंकित है।  ओझा समाज के गौरव



अधिक जानकरी देखे 👉 स्वतंत्र सेनानी मंशु ओझा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं है । 



और शायद यही कारण है कि अंग्रेजों के साथ स्थानीय रियासतों के शासकों ने भी ओझाओ  की स्वतंत्रता में कभी बाधक बनने का साहस नहीं किया। 


अपनी उत्पत्ति के आरंभ से मेहनतकश और मस्ती में डूबे रहने वाले ओझा खुद को प्रकृति के पूजक एवं  निकट रहना और रखना पसंद करते रहे हैं और इन्हीं कारणों से पहाड़ों के बीच रहना उन्हें आज भी पसंद है। 


जनपदीय सामाजिक व्यवस्था से परे वे अलग-थलग ही रहना पसंद करते हैं। देश की दूसरी जनजाति की तरह ही ओझा भी स्वयं को धरती पुत्र मानते हैं और वनोपज से अपना जीवन-यापन करते हैं। 


भारत सरकार के सूचि में देखे आदिवासी ओझा समाज
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